'' प्रो. डा. जतीन्द्रमोहन मिश्रा- प्रभावी व्यक्तित्व के धनी।''
- डा. चन्द्रहास शास्त्री सोनपेठकर
- डा. चन्द्रहास शास्त्री सोनपेठकर
आदरणीय प्रो. डाॅ. जतीन्द्रमोहन मिश्रा सर से मेरा परिचय लगभग दस साल से है। ज्ञान की आभा तथा वाणी की मधुरता उनके व्यक्तित्व में समाहित है। यतियों के मुखियां भी मानों मिश्रा सर के वक्तृत्व पर मोहित होते हैं।
मिश्रा सर आज एन सी ई आर टी संस्था मे सहयोगी प्राध्यापक हैं। हाल ही में उन्होंने संस्कृत राष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल आयोजन किया । इस दौरान वह न तो थके हुंए दिखे न ही रुके हुंए । बस् व्यस्त अवश्य थे।
इस संगोष्ठी में मै सहभागी होना चाहता हूं, यह सुनकर प्रसन्न हुंए । मेरा संशोधन संस्कृत अभिरुचि को लेकर है, यह सुनकर तो अतीव प्रसन्न हुंए । मुझे मार्गदर्शी सूचनाएँ भी दी। उनके साथ संवाद करते समय ऐसा लगता है, जैसे हमें अभी बहूत कुछ सिखना हैं।
यह न केवल मेरा अपितु अनेक लोगों का अनुभव होगा। शांतचेतस् रहते हैं। यतीन्द्र जो ठहरें।
कठिन परिश्रम करते है। कर्मठ है। सुहास्यवदन है। सदैव अपने मित्रों को कार्य करने हेतु प्रेरित करते है, मार्गदर्शन करते है। अनुशासनप्रिय है। तथा समायोजन कुशल भी है।
संगोष्ठी के तीन दिन तथा उससे पूर्व एक माह तक उन्होंने जो परिश्रम की पराकाष्ठा की, वह तो अद्वितीय थी। हर एक प्रतिभागी उनके बारे मे बोलने के लिए लालायित था। सामनेवालेका मन जितकर कैसे कार्यक्रम सफल बनाए, यह कोई उनसे ही सिखे।
समादरणीय प्रो. डा. मिश्रा सर का स्नेह ऐसे ही मिलता रहें, उनसे हम जिज्ञासा, विनम्रता एवं यशस्विता का पाठ पढ़ते रहें, सरजी और भी अनेकानेक उच्च स्थान विभूषित करें, इसी मंगलकामना के साथ;
जय श्रीकृष्ण!!!
मिश्रा सर आज एन सी ई आर टी संस्था मे सहयोगी प्राध्यापक हैं। हाल ही में उन्होंने संस्कृत राष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल आयोजन किया । इस दौरान वह न तो थके हुंए दिखे न ही रुके हुंए । बस् व्यस्त अवश्य थे।
इस संगोष्ठी में मै सहभागी होना चाहता हूं, यह सुनकर प्रसन्न हुंए । मेरा संशोधन संस्कृत अभिरुचि को लेकर है, यह सुनकर तो अतीव प्रसन्न हुंए । मुझे मार्गदर्शी सूचनाएँ भी दी। उनके साथ संवाद करते समय ऐसा लगता है, जैसे हमें अभी बहूत कुछ सिखना हैं।
यह न केवल मेरा अपितु अनेक लोगों का अनुभव होगा। शांतचेतस् रहते हैं। यतीन्द्र जो ठहरें।
कठिन परिश्रम करते है। कर्मठ है। सुहास्यवदन है। सदैव अपने मित्रों को कार्य करने हेतु प्रेरित करते है, मार्गदर्शन करते है। अनुशासनप्रिय है। तथा समायोजन कुशल भी है।
संगोष्ठी के तीन दिन तथा उससे पूर्व एक माह तक उन्होंने जो परिश्रम की पराकाष्ठा की, वह तो अद्वितीय थी। हर एक प्रतिभागी उनके बारे मे बोलने के लिए लालायित था। सामनेवालेका मन जितकर कैसे कार्यक्रम सफल बनाए, यह कोई उनसे ही सिखे।
समादरणीय प्रो. डा. मिश्रा सर का स्नेह ऐसे ही मिलता रहें, उनसे हम जिज्ञासा, विनम्रता एवं यशस्विता का पाठ पढ़ते रहें, सरजी और भी अनेकानेक उच्च स्थान विभूषित करें, इसी मंगलकामना के साथ;
जय श्रीकृष्ण!!!
No comments:
Post a Comment